Sunday, 5 July 2026

सच

 सच क्या है…

बस एक दृष्टिकोण,

मेरी नज़र में मेरा सच,

आपकी नज़र में आपका सच।

प्रेम में सच कुछ होता है,

गुस्से में सच कुछ और।

कहने का सच अलग,

दिखाने का सच और।

कई सच जो कभी कहे ही नहीं जाते,

कई सच कहे भी जाएँ तो सुने नहीं जाते।

सच कोई मानता नहीं,

बस हर कोई निकाल लेता है

दूसरों के सच से अपना सच।

सच कोई देखता नहीं,

समझता नहीं।

कह दो तो तूफ़ान है सच,

ना कहो तो भँवर है सच।

पर जो सच में सच को जानता है,

उसके लिए सच ही है

सबसे गहरा सुकून।

निकिता जैन 5 जुलाई 2026 बैंगलोर 

Sunday, 21 June 2026

कुछ नहीं करती हो तुम सारा दिन

 मैं कुछ ख़ास नहीं करती।  

बस परिवार के लिए खाना बना देती हूँ, बच्चों को पढ़ा देती हूँ।  

कभी मेहमान आ जाएँ या त्योहार पास आ जाए तो घर सजा देती हूँ, बस।  


बाकी तो कुछ बड़ा काम नहीं करती।  

हाँ, घर में क्या चीज़ कहाँ रखी है, राशन कब लेना है, किस रिश्तेदार से कब बात करनी है — यह सब मुझे पता रहता है।  

पर दिन भर यूँ ही खाली रहती हूँ।  


बच्चों के छोटे‑मोटे प्रोजेक्ट्स, सांस्कृतिक गतिविधियाँ या इधर‑उधर की कला करवा देती हूँ, और कुछ ख़ास नहीं।  

और हाँ, वो एक छोटी‑सी 9 से 5 की नौकरी भी कर लेती हूँ, जिसमें खाली बैठने के भी पैसे मिल जाते हैं।  


मैं कुछ नहीं करती।  

पर मुझे लगता है कि वो डॉक्टर, वो शिक्षक, वो किसी कंपनी की सीईओ, या वो अंतरिक्ष जाने वाली महिला भी कुछ नहीं करती होंगी।  

और देश की राष्ट्रपति — वो भी कुछ नहीं करती।  

आख़िर देश चलाना कौन‑सी बड़ी बात है!

मेरी प्यारी बहन निकिता की कविता 

22जून 2026 बंगलुरु 

Thursday, 16 May 2024

जल साक्षरता-3 नदियों का पानी जैसे परियों की कहानी ! सुनील चतुर्वेदी



बीसवीं सदी का काउंटडाउन शुरू हो चुका था । दस..नो..आठ ! ज़मीन के नीचे का पानी तेज़ी से गहरे उतर रहा था तो ज़मीन के ऊपर बहने वाली नदियाँ भी सिमटती जा रही थी । 

बात 2001-02 की होगी । मैं अपने बेटे के साथ उज्जैन सिद्धवट गया तो  सन् 1974-75 का समय आँखों के सामने जीवंत हो उठा । मंदिर के ठीक नीचे वाली सीढ़ियों पर रुककर नदी की तरफ़ पीठ फेरे मैं बेटे को सुनाने लगा ।
“ गर्मियों की छुट्टियों में हम सब मामा, चाचा, बुआ के भाई-बहिन मेरी बड़ी बुआ के घर इकट्ठा होते ।सुबह होते ही हम 10-12 बच्चों की फ़ौज घर से सिद्धनाथ घाट की ओर चल पड़ती। आगे-आगे बड़ी बहिनें बग़ल में कपड़ों की पोटली दबाये और पीछे-पीछे हम बच्चों का टुल्लर । बहिनें घाट पर कपड़े धोते हुए गपियाती रहती और हम यहाँ इस जगह  खड़े होकर दोनों पैर का गंटा लगाकर नदी में कूदते और छपाक की आवाज़ के साथ पानी बहुत ऊपर तक उछलता । तुम्हारी बड़ी बुआ  हमारे खेल की जज होती । जिसके कूदने पर सबसे ज्यादा ऊपर पानी उछलता वो जीत जाता । यह हमारा रोज़ का खेल था । फिर घंटे दो घंटे तैरते रहते । तैरते-तैरते थोड़ा आगे निकल जाते तो पैरों या शरीर के और किसी हिस्से पर सूँस टकरा जाती । उन दिनों क्षिप्रा में सूँस बहुत होती थी ।हम डरकर किनारे लौट आते । ऐसी मज़ेदार होती थी हमारी गर्मियों की छुट्टियाँ । तुम्हारी तरह दिन-भर वीडियो गेम नहीं खेलते थे ।”
मेरी बात ख़त्म होते ही बेटे ने संदेह से मेरी ओर देखते हुए पूछा, “पापा आप पक्का यहाँ से कूदते थे ? “
“हाँ , क्यों..?”
“पीछे मुड़कर देखो “
मैंने देखा नदी की तलहटी में जगह-जगह चट्टानें उभरी हुई थी । उनके बीच कहीं-कहीं पानी के पोखर थे ।मात्र पच्चीस-तीस साल में कभी क्षीर सी उफनती नदी मर रही थी । मैं चुपचाप घाट से लौट पड़ा । रास्ते में बड़ा बेटा हंसते हुए अपने से पाँच साल छोटे भाई से कह रहा था “ पता है , पापा परियों की कहानी को अपनी स्टोरी बनाकर हमें सुना रहे थे । इतने ऊपर से फेंटम भी पत्थर पर कूदेगा तो उसके भी हाथ-पाँव फ्रेक्चर हो जाएँगे । “

यह वही समय था जब नदियाँ मर रही थीं । देशभर में लगभग छोटी-बड़ी 400 नदियाँ हैं और सहायक नदियों की सहायक नदियाँ मिलाकर नदियों की संख्या हज़ारों में है । इनमें से 30 प्रतिशत से अधिक नदियाँ या तो सूख चुकी हैं या नाले में तब्दील हो गयी हैं । एक अनुमान यह भी है कि पिछले 75 सालों में क़रीब 20 लाख तालाब, पोखर, झीलें ग़ायब हो गयी हैं । अब नदियों के मरने, तालाबों के गुम होने की रपट कहाँ और कौन लिखाये !

यहाँ यह बात भी गौर करने कि है, इस समय में भूजल स्तर का कम होना और नदियों का मरना दोनों घटनाएँ एक साथ घट रही थी । 

तो क्या ज़मीन के नीचे और सतह पर बहने वाले पानी की बीच कोई अंतरसंबंध है ?
आप क्या सोचते हैं …

Tuesday, 14 May 2024

जल साक्षरता - 2 पानी ने बरसाया पैसा और गहराया संकट. सुनील चतुर्वेदी



मैं सन् नब्बे के दशक में अपने काम के सिलसिले में मध्यप्रदेश के कई गावों में घूमते हुए पानी को लेकर बदलता हुआ मंजर देख रहा था। कुएँ, बावड़ी, तालाब खुदवाने का युग बीत रहा था । सत्तर-अस्सी के दशक में ट्यूबवेल खोदने वाली छुक-छुक मशीन (केलेक्स मशीन)  गुम हो रही थी । केलेक्स मशीन 60-70 मीटर से ज्यादा गहरे नहीं खोद पाती थी और उसमें भी महीने भर से ज़्यादा का समय लग जाता । यह वही समय था जब पानी से परलोक सुधारने वाली मान्यता दम तोड़ रही थी । ज़मीन से पानी निकालने वाली फटाफट वाली  एक नयी “ट्यूबवेल संस्कृति” का तेज़ी से उदय  हो रहा था । 

दक्षिण भारत से आयी ट्रक पर कसी पीली मशीनें दिवाली के बाद से ही गाँव-गाँव दिखायी पड़ने लगती। मेरा काम भी बढ़ रहा था । किसान नारियल घुमाने के साथ  मशीन से भी पानी चखवाते और हम हाइड्रोजियोलॉजिस्ट किसानी भाषा में “पानी चखने वाले” कहलाने लगे । 

गाँव-गाँव एकसे दृश्य थे । धड़-धड़ की आवाज़ के साथ ज़मीन के नीचे कड़क पत्थरों को भेदती मशीनें, 300-350 फुट की गहरायी से ज़मीन के नीचे से फूटता पानी का फ़व्वारा या कहीं केवल धूल का ग़ुबार । सरकार गाँव-गाँव हैंडपंप लगवा रही थी और किसान सिंचाई के लिए निजी ट्यूबवेल खुदवा रहे थे । शहरों, क़स्बों में ट्यूबवेल ठेकेदार नाम की प्रजाति पैदा हो गयी थी ।रसूखदार और नेताओं के गठजोड़ से कारपोरेट कल्चर वाली ट्यूबवेल ड्रिलिंग कंपनियाँ बना कर सरकारी ठेके लिये जा रहे थे ।

गाँवों में हैंडपंप राजनीति का केंद्र बन रहा था । हैंडपंप के बदले वोट । ड्रिलिंग कंपनियाँ और ठेकेदार 400-450 फुट तक खोदकर पैसा कमा रहे थे और अधिकारी काम देने के बदले मोटा कमीशन । कोई पूछता, कितना गहरा खोदें ? जवाब में एक ही जुमला था पानी भले 250-300 पे निकल आये पर कम से कम 400 तो खुदवाओ । दो- पाँच साल में पानी नीचे उतरेगा तो फिर नया बोर नहीं करवाना पड़ेगा । गोया ट्यूबवेल नहीं किसी बच्चे की पेंट सिलवायी जा रही हो। दो- तीन इंच का मार्जिन रखकर उलट दो ताकि बच्चे की लंबाई बढ़ने पर तुरपायी खोली जा सके । 

धरती को चीरकर नीचे का पानी निकालने के काम में पैसा ही पैसा था । आज यह कई गुना बढ़ गया है । वर्तमान में भारत में अकेले बोतल बंद पानी का व्यवसाय पच्चीस हज़ार करोड़ से कहीं अधिक का है । 

नब्बे के दशक के बाद से ही देश के कई इलाक़ों से गर्मियों आते ही पानी के संकट की खबरें भी आने लगी थीं । वर्ष 1995 में तो देवास में लोगों की प्यास बुझाने के लिये ट्रेन से पानी मँगवाया गया था । जल संकट के साथ ही शहरों में सड़कों पर ट्रेक्टर के पीछे खींचते टैंकर दिखायी पड़ने लगे जिन पर पीले या नीले रंग से लिखा होता पानी का टैंकर. 

धरती का सीना छलनी हो रहा था , पानी गहरे उतर रहा था, पानी से पैसा बन रहा था और होले-होले जल संकट पैर पसार रहा था । 
क्रमशः

Sunday, 12 May 2024

जल साक्षरता भाग 1 अपने उतार पर है पानी ! सुनील चतुर्वेदी


बात 1985 की है । यह साल भू-जल वैज्ञानिक के रूप में मेरे काम का शुरुआती साल था । मध्यप्रदेश के राजगढ़ ज़िले के गावों में मुझे ट्यूबवेल खनन के लिए जियोफ़िज़िकल सर्वे कर वो जगह चिन्हित करनी थी जहां पानी हो। यह किताबों से बाहर ज़मीनी हक़ीक़त से रूबरू होने और सीखने के दिन थे । मैं मुस्तेदी से अपने काम में जुट गया । 

गाँव में जब पहुँचता तो कच्चे मकानों की दीवारों पर गेरू से दो नारे ज़रूर लिखें मिलते ।                    “ कुएँ-बावड़ी का छोड़ो साथ, हेंडपम का थामो हाथ “                                                                        और दूसरा “ गुरु करो जान, पानी पियो छान” 
एक पानी के स्रोत के लिए और दूसरा पानी की स्वच्छता को लेकर। असल में यह नारे इसलिए लिखे गये थे कि राजगढ़ एशिया का सर्वाधिक नारू रोग से ग्रस्त ज़िला था । यहाँ कुएँ बावड़ियों को बंद किया जा रहा था और पेयजल के लिए गाँव-गाँव ट्यूबवेल खोदे जा रहे थे।

उस दौर में यानि आज से लगभग 39 साल पहले यदि हमें पानी की तलाश में 100 फुट से गहरे जाना पड़ता तो हम आश्चर्य से भर जाते । बाप रे ! इस गाँव में तो 120 फुट नीचे पानी मिला । ट्यूबवेल होते रहे और अगले चार सालों में क़रीब 300 फुट गहरे ट्यूबवेल सामान्य हो गया । 

इसके 15-17 साल पीछे जाऊँ तो बचपन में गर्मियों की छुट्टियों में जब अपनी दादी के साथ अपने गाँव से रिश्तेदारी में दूसरे गाँव जाता तो दादी अपने झोले में एक पीतल का लोटा और चार- पाँच हाथ की पतली सी सूत की रस्सी रखना नहीं भूलती । वो इसलिए कि रास्ते में प्यास लगने पर किसी कुएँ से पानी निकाला जा सके । 

कहने का आशय यह है कि 1970-72 के आसपास पानी इतना ऊपर था कि पानी निकालने के लिए चार-पाँच हाथ की रस्सी ही पर्याप्त थी और सन् नब्बे के आते-आते पानी 300 फुट गहरे उतर चुका था । 
जो आज 45-50 की उम्र के हैं उनके अनुभव में यह बात होगी लेकिन नयी पीढ़ी के लिए जैसे कोई कहानी ! 
क्रमश:

Monday, 23 August 2021

मायका हिंदी लघु कथा

रक्षा बंधन पर बेटियां अपने मायके आना चाहती है किन्तु क्या हुआ की दूर हो गयी मायके से नीलम और प्रीती जानने के लिए सुनिए विशाखा गुप्ता की भावनात्मक कहानी मायका जिसे प्रस्तुत किया है हेमलता जैन "रचना" जी ने